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Author(s): सीमा पाल, आभा रूपेन्द्र पाल

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Address: पं. रविशंकरशुक्ल वि.वि. रायपुर (छ.ग.)

Published In:   Volume - 23,      Issue - 1,     Year - 2017

ABSTRACT:
वैदिक काल में स्त्रियों को भी पुरूषों की भांति ही शिक्षा की सुविधाएं और अवसर उपलब्ध थे।अथर्ववेद में स्पष्ट ही कन्या के द्वारा ब्रह्यचर्य की व्यवस्था के पालन का उल्लेख है।मनु और कुछ बाद के स्मृतिकारो से भी मालूम होता है कि पूर्वकाल मे लड़कियों का भी उपनयन संस्कार होता था।प्रायः कन्या के विवाह की आयु 16 या 17 थी, इसलिए उन्हें शिक्षा प्राप्त करने का समय मिलता था।कुछ लड़कियां विवाह की आयु हो जाने पर भी अध्ययन समाप्त नही करती थीं,उन्हें ‘ब्रम्हवादिनी’ कहते थे । ऐसी स्त्रिया जो अध्यापन का कार्य करती थीं,उनके लिए ‘आचार्य’/‘उपाध्याया’ आदरसूचक शब्द का प्रयोग होता था। ‘औदमेघाः’ शब्द पर पतंजलि की व्याख्या से स्पष्ट है कि छात्र शिक्षिकाओं के उपयोग के लिए बने आवास ‘छात्रीषाला’ कहलाते थे। स्त्रियों को वैदिक साहित्य के अध्ययन और यज्ञों को करने का अधिकार था।

Cite this article:
सीमा पाल; आभा रूपेन्द्र पाल, "आधुनिक काल मेें महिला शिक्षा-समसामयिक संदर्भ में", Journal of Ravishankar University (Part-A: SOCIAL-SCIENCE), 23(1), pp. 47-51.


References:

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