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Author(s): पृथ्वीवल्लभ चंद्राकर

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Address: दर्शनशास्त्र विभाग दुर्ग
महाविद्यालय, रायपुर.

Published In:   Volume - 5,      Issue - 1,     Year - 1992

DOI: Not Available

ABSTRACT:
अवतार की अवधारणा मूलतः वैदिक मान्यता है । विश्व के कल्याण के लिये परब्रह्म का अनेक रूपों में जन्म ग्रहण करना अवतार कहलाता है । यद्यपि ब्रह्म अवांगमनस गोचर है, अव्यक्त तथा अक्षर है, तथापि भक्त की भावना के प्रकाश में व्यक्त होता है । ईश्वर का शरीर ग्रहण करना कर्माश्रित न हो कर उसकी स्वतंत्र इच्छा और करूणा का परिणाम है । जीव के प्रति करूणा और प्रेम ही ईश्वर को अवतार ग्रहण करने तथा विभिन्न प्रकार की लीला करने को प्रेरित करती है, ताकि अज्ञात के अंधकार में भटकते हुए दिशा शून्य जीवों को सही मार्ग मिल सके । अवतार के रूप में ईश्वर जीवों को सदैव शुभ और कल्याण की ओर प्रेरित करता है । कष्ट और दुख के क्षणों में वह जीव में आशा और विश्वास की किरण उत्पन्न करता है, जिससे वह जीवन की विपरीत परिस्थितियों में भी अविचलित और प्रसन्नचित रहता है, क्योंकि उसे विश्वास रहता है कि दुख और कष्ट के इस वियावान में वह अकेला नहीं है ।

Cite this article:
चंद्राकर (1992). अवतार - तत्व मीमांसा. Journal of Ravishankar University (Part-A: SOCIAL-SCIENCE), 5(1), pp.29-33.


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