ABSTRACT:
पृथ्वी पर मानव जीवन के सम्पूर्ण आलोकन में भारतीय ज्ञान परम्परा मनुष्य को आध्यात्मिक स्वतन्त्रता और पूर्णता का लक्ष्य तथा दिशा प्रदान करती है तथा उसे अवरूद्ध पन्थ या प्रणाली में बन्धनग्रस्त होने से बचाती है। यह सदैव आगे चलने, बढ़ने और विकसित होने के लिए मार्ग प्रशस्त कराती है तथा उसे सöावना और सहनशीलता के भावों में स्थिरत्व प्रदान कर यह बोध कराती है कि ’लक्ष्य एक है, मार्ग अनेक।’ आधुनिक जगत में मानवीय मूल्य एवम् जीवन का परम् लक्ष्य धूमिल हो गए हैं। अतः उसे भारतीय ज्ञान पद्धतियों का अनुसरण कर अपना मार्ग बदलना होगा। जिस प्रकार बृहदारण्यक उपनिषद् (1/3/28) में वैदिक स्तुति कहती है - ’असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय, मृत्योर्मामृतं गमय।’ अर्थात् ’मुझे असत से सत् की ओर, तम से ज्योति की ओर एवम् मृत्यु से अमरत्व की ओर ले चलो।’ जीवन के परम् लक्ष्य की प्राप्ति हेतु भारतीय ज्ञान परम्परा के अन्तर्गत् योग दर्शन एवम् बौद्ध दर्शन में सन्निहित साधना पद्धतियों का ज्ञान अत्यन्त उपयोगी एवम् महत्वपूर्ण है।
भारतीय ज्ञान परम्परा के अन्तर्गत् योग दर्शन एवम् बौद्ध दर्शन मंे सन्निहित शिक्षाओं के माध्यम से प्रस्तुत शोध आलेख में जीवन के परम् लक्ष्य की प्राप्ति एवम् उसकी सार्थकता पर विचार करने का प्रयास किया गया है। शारीरिक, मानसिक, संवेदनात्मक, सामाजिक एवम् आध्यात्मिक प्रगति हेतु योग दर्शन एवं बौद्ध दर्शन में प्रशस्त मार्ग एक सम्यक मार्ग है जिसका अनुसरण कर जीवन के परम् लक्ष्य की प्राप्ति के साथ-साथ आदर्श समाज का निर्माण किया जा सकता है।
Cite this article:
वासनिक और सिंह (2026). भारतीय ज्ञान परम्परा एवम् जीवन का परम् लक्ष्यः योग दर्शन एवम् बौद्ध दर्शन के परिप्रेक्ष्य में. Journal of Ravishankar University (Part-A: SOCIAL-SCIENCE), 32(1), pp.85-91. DOIDOI: https://doi.org/10.52228/JRUA.2025-32-1-10