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Author(s): शिखा, रिया तिवारी

Email(s): shikhaumre1989@gmail.com

Address: ग्रेसियस कॉलेज ऑफ एजुकेशन, अभनपुर-रायपुर (छ.ग.)
ग्रेसियस कॉलेज ऑफ एजुकेशन, अभनपुर-रायपुर (छ.ग.)

*Corresponding Author: shikhaumre1989@gmail.com

Published In:   Volume - 32,      Issue - 2,     Year - 2026


Cite this article:
शिखा और तिवारी (2026). बस्तर जिला में जनजातीय विद्यार्थियों की शिक्षा - एक अध्ययन (लोहांडीगुड़ा विकासखंड के विशेष संदर्भ में). Journal of Ravishankar University (Part-A: SOCIAL-SCIENCE), 32(2), pp.82-87. DOI:https://doi.org/10.52228/JRUA.2026-32-2-8



बस्तर जिला में जनजातीय विद्यार्थियों की शिक्षा - एक अध्ययन (लोहांडीगुड़ा विकासखंड के विशेष संदर्भ में)

शिखा1, रिया तिवारी2

1-2ग्रेसियस कॉलेज ऑफ एजुकेशन, अभनपुर-रायपुर (छ.ग.)

*Corresponding Author: shikhaumre1989@gmail.com

सारांश:-

जनजातियाँ पृथक-पृथक तरीकों से अपनी जिन्दगी गुजारते हैं। इनका सामुदायिक जीवन और रहन-सहन भी अलग है। ये एक निश्चित भौगोलिक वाले स्थानों में रहते हैं। इनकी अपनी संस्कृति, रीति-रिवाज, रूढ़िवादितायें तथा धार्मिक आस्था है। जो इन्हें जागरूक समाज से पृथक करते हैं और आकर्षण का कारण भी बनते है। यहाँ की जनजातियों की शिक्षा का स्तर देश की शिक्षा स्तर से अपेक्षाकृत कम है। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार यहाँ के जनजातीय शिक्षा का स्तर 53.15 प्रतिशत है जबकि देश की शिक्षा का स्तर 75 प्रतिशत है यह अध्ययन बस्तर जिला में जनजातीय विद्यार्थियों की शिक्षा तथा इसमें आने वाली बाधाओं पर केन्द्रित है जिसे लोहान्डीगुड़ा विकासखंड के संदर्भ में प्रक्षेपित किया गया है। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार बस्तर की पुरूष साक्षरता दर 64.39 प्रतिशत जबकि महिला साक्षरता दर 55.46 प्रतिशत है।

लोहान्डीगुड़ा तहसील का साक्षरता दर 38.85 प्रतिशत है। जिसमें पुरूष की साक्षरता दर 40 प्रतिशत है जबकि महिला साक्षरता दर 25.26 प्रतिशत है, लिंगानुपात 1038 है।

शब्दकुंजी - जनजातीय, रीति-रिवाज, विद्यार्थियों व साक्षरता दर।

1.   प्रस्तावना:-

वेरियर एलविन ने इन जातियों को देश का ‘‘मूल स्वामी’’, वोब्स महोदय ने इन्हें वन्य जाति तथा प्रसिद्ध’ समाज सुधारक डॉ. धुरिये ने इन्हें तथाकथित आदिवासी अथवा ‘पिछड़े हुये हिन्दू’ की अभिधा से संबोधित किया है। इसी प्रकार गिलिन और गिलिन इन्हें एक समान संस्कृति वाला नवजातीय समूह तथा मजूमदार नें इन्हें एक निश्चित भू-भाग में निवास करने वाले जनजाति परिवारों तथा पारिवारिक वर्गोें का एक समूह माना है।

भारतीय संदर्भ में लिंटन राल्फ ने जनजातियों की निम्न विशेषताओं की ओर इंगित किया है-

(अ) ये एक  जनजातीय टोली का समूह है जिनका एक भूखंड का भू-भाग पर अधिकार होता है और जिनमें अपनी संस्कृति में गहन समानता तथा परस्पर हितों की प्राथमिकतायें विद्यमान होती है।

(ब) ये सभ्य जगत् से दूर तथा दुर्गम स्थानों में रहते हैं।

(स) इनकी अपनी स्वयं की पृथक एक भाषा होती है जो जनजातीय भाषा कहलाती है।

(द) इनका निग्रोज, एस्ट्रोलायर्ड, अथवा मंगोलायर्ड में से किसी एक प्रजाति समूह से गहरा सम्बन्ध होता है।

(य) ये आर्थिक रूप से पिछड़े होते हैं, जो वनों पर आधारित वनोपज से जीविका का यापन करते हैं। जैसे- महुआ, इमली, तेंदुपत्ता, लकड़ी काटना व बेचना इसके अतिरिक्त वनों पर आधरित बहुमूल्य वस्तुयें आदि।


 

जनजातीय शिक्षा –

वर्ष 2011 भी जनगणनानुसार भारत में अनुसूचित जनजाति की जनसंख्या 10.45 करोड़ हैं। लेकिन यह कुल जनसंख्या की 8.6 प्रतिशत है। बस्तर जिले की लोहांडीगुड़ा तहसील की कुल जनसंख्या 2011 की जनगणना के अनुसार 75842 है। इनमें से 37209 पुरूष तथा 38,633 महिलायें हैं। यहाँ का लिंगानुपात 1038 हैं। साक्षारता दर 38.8 प्रतिशत है। जिसमें पुरूष साक्षारता दर 40 प्रतिशत और महिला साक्षारता दर 25.26 प्रतिशत है।

जनजातीय शिक्षा को प्रभावित करने वाले कारक –

 (1) अन्य छात्रों का रवैया/व्यवहार - यह उन महत्वपूर्ण कारकों में से एक है जो जनजातियों की शिक्षा को प्रभावित करता है।

(2) सामाजिक कारक - अभी भी व्यापक रूप से यह भावना व्याप्त है कि शिक्षा इनके बच्चों को पथभ्रष्ट, उद्दंड और समाज के बाकी हिस्से से पृथक कर देती है। उदाहरण के तौर पर कुछ शिक्षित आदिवासी बच्चे शिक्षा प्राप्त कर अपने गाँव और परिवार से सम्बन्ध तोड़ लेते हैं।

(3) आर्थिक कारक - विजया लक्ष्मी (2003) का अध्ययन जनजातीय छात्रों की समस्याओं की ओर इशारा करता हैः अधिकांश आदिवासी बच्चे परिवार के कार्यो यथा - पशु चराना, मजदूरी करना, जलाऊ लकड़ी लाना, वन उत्पाद एकत्र करना, पत्थर खदानों में कार्य करना, आदि है। आदिवासी क्षेत्रों में प्रौद्योगिकी का उपयोग अत्यन्त निम्न स्तर पर बना हुआ है।

(4) औपचारिक शिक्षा में रूचि की कमी - जनजातीय बच्चों को ऐसी शिक्षा में अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है तथा शिक्षकों की अनुउपलब्धता, शिक्षा का माध्यम क्षेत्रीय भाषा का होना आदि है।

(5) सुविधाओं का अभाव - विजया लक्ष्मी (2003) के अध्ययन के अनुसार आदिवासी क्षेत्रों के आवासीय विद्यालयों में बुनियादी सुविधाओं की बहुत कमी है। स्वच्छता की स्थिति खराब है। दोपहर के भोजन की व्यवस्था भी अपर्याप्त है।

(6) आवास की प्रकृति - आदिवासी ग्रामीण क्षेत्र बिखरा हुआ है, एतदर्थ स्कूल जाने के लिये लम्बी यात्रा करनी पड़ती है। पारिवारिक वातावरण बच्चों के शिक्षा में सहायक होता है। इनके माता-पिता निरक्षर तथा मदिरा जैसे पेय पदार्थ पीने के आदि है। जो बच्चों की शिक्षा में प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं।

(7) हितधारकों का सहयोग - आदिवासी बच्चों की शिक्षा को बढ़ावा देने के लिये सहयोग आवश्यक शासकीय प्रयास है। जो राशि स्वीकृत होती है वह अनेक दलों से होकर गुजरती है जो देरी और प्रवाह का कारण बनती है और यही इनकी शिक्षा में बाधक बनती है। भार्गव (1989) का अध्ययन भी इस बात की पुष्टि करता है कि जनजातीय बच्चों को दी जाने वाली सुविधाओं अन्य वर्गो को दी जाने वाली सुविधाओं की तुलना में कमजोर है। जैसे पाठ्य पुस्तकें, वर्दी (मुफ्त) तथा वजीफा आदि।

अध्ययन के उद्देश्य  (Objective of the study)

प्रस्तुत अध्ययन निम्न उद्देश्यों पर आधारित है:-

(1) परिवार और स्कूल में छात्रों की उन समस्याओं का अध्ययन करना जो उनकी शिक्षा में बाधा डालती है।

(2) जनजाजीय शिक्षा के लिये सरकार द्वारा दी गयी सहायता और उसके उपयोग की पहचान करना।

(3) शिक्षा के सम्बन्ध में मौजूद स्थिति में सुधार के लिये उपयुक्त सुधारात्मक उपायों को सुझाव देना, जो इनकी शिक्षा के वृद्धि में सहायक हो।

 

शोध प्रविधि (Research Methodology):-

दो पंचायतों के सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले 300 बच्चों का सरल यादृच्छिक प्रतिचयन विधि द्वारा चयन किया गया। यह अध्ययन साक्षात्कर अनुसूची के माध्यम से प्राथमिक समंकों पर आधारित है। स्पष्टता का विशिष्टता के लिये साक्षात्कार अनुसूची का पहले पूर्व-परीक्षण किया गया और पूर्व-परीक्षण से प्राप्त अनुभव के आधार पर आवश्यक संशोधन किये गये। तत्पश्चात् समंको का संग्रहण किया गया। प्राप्त समंकों में सरल सांख्यिकीय विधियों ;ैजंजपेजपबंस ज्ववसे द्ध यथा प्रतिशत आदि का प्रयोग कर निष्कर्ष ज्ञात किये गये तत्पश्चात् विश्लेषित किया गया जो अग्र सारणीयन तथा विश्लेषण से स्पष्ट है।

यह अध्ययन बस्तर जिले के लोहांडीगुड़ा विकासखंड का किया गया है। अध्ययन के लिये सरकारी तथा गैर सरकारी विद्यालयों में पढ़ने वाले 150 आदिवासी बच्चें, 60 आदिवासी अभिभावक, 70 स्कूल शिक्षक तथा 20 स्कूल - शैक्षणिक प्रशासकों को यादृच्छिक रूप से नमूनाकरण विधि द्वारा चयन किया गया। इस प्रकार कुल 300 न्यादर्श का चयन किया गया है। यह अध्ययन प्राथमिक समंकों पर आधारित है। यदा-कदा द्वितीयक समंकों का भी प्रयोग किया गया है। प्राथमिक समंक साक्षात्कर अनुसूची और इसकी विशिष्टता के आधार पर परीक्षण किया गया। प्राप्त समंको में सरल सांख्यिकीय विधियों यथा सारणीयन, प्रतिशत, औसत, कार्य वर्ग परीक्षण आदि के आधार पर निष्कर्ष प्राप्त किये गये हैं। जिनका विश्लेषण किया गया हैं।  

तलिका – 1

शिक्षा प्राप्त करने में आने वाली बाधायें (Hardless in pursuing education)

क्रमांक

कारण

आवृत्ति (F)

प्रतिशत (Percentage)

1

पाठ्यक्रम की जटिलता

60

23.53

2

नियमित शिक्षकों की अनुपस्थिति

55

21.56

3

अपर्याप्त अभिभावक का सहयोग

50

13.73

4

बस की सुविधा का अभाव

60

23.53

5

निर्धनता

75

17.65

योग

300

100

 

तालिका क्रमांक 1 के विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि अधिकांश उत्तर दाताओं ;23ण्53 प्रतिशतद्ध का कहना है कि स्कूल पहुँचने के लिये पर्याप्त सुविधायें नहीं है। अधिकांश जनजातियाँ दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों में रहती हैं अतः विद्यालय पहुँचने में कठिनाई होती है। कम उम्र में छात्रों के लिये कई किमी. पैदल चलना अथवा लम्बी दूरी तय करना मुश्किल होता है। 22 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने यह बताया कि विद्यालयों में नियमित शिक्षकों की कमी है। निष्कर्षतः यह कह सकते हैं कि बुनियादी ढांचागत सुविधाओं और संचार प्रणाली की कमी इसका कारण है। शिक्षा प्राप्त करने में सहायक कारकों में माता-पिता का सहयोग, शिक्षकों का सहयोग, उच्च रहन-सहन, अच्छा व्यवसाय तथा शासकीय अनुदान यथा वित्तीय सहायता (स्कॉलरशिप) आदि जनजातीय बच्चों की शिक्षा प्राप्त करने में महत्वपूर्ण घटक हैं।

तालिका 2

शिक्षा प्राप्त करने में सहायक घटक (Motivating Factor for pursuing Education)

क्रमांक

Lkgk;d ?kVd (Motivating Factor)

आवृत्ति (F)

प्रतिशत (Percentage)

1

माता-पिता का सहयोग

90

30.00

2

शिक्षक सहयोग

60

20.00

3

उच्च रहन-सहन

80

26.67

4

अच्छा व्यवसाय

45

15.00

5

शासकीय अनुदान

25

8.34

योग

300

100-00

 

तालिका क्रमांक 2 के विश्लेषण से स्पष्ट होता है, कि 30 प्रतिशत उत्तरदाताओं का मानना है कि शिक्षा प्राप्त करने में माता-पिता का अनुपम सहयोग होता है। उनके सहयोग के बिना शिक्षा की कामना भी नही की जा सकती। अधिकांश उत्तरदाताओं (26 प्रतिशत) का मानना है कि तेजी से शिक्षा प्राप्त करने से शीघ्र ही रोजगार के अवसर मिलेंगे जिससे उनका जीवन-स्तर ऊँचा होगा 15 प्रतिशत उत्तरदाताओं के अच्छा व्यवसाय तथा 8.34 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने यह माना कि सरकार से   मिलने वाली वित्तीय सहायता (छात्रवृत्ति) उन्हें अपनी शिक्षा जारी रखने के लिये प्रेरित करेगी। जबकि 20 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने यह माना कि शिक्षकों के सहयोग के बिना शिक्षा प्राप्त नहीं की जा सकती क्योंकि अभिभावक तथा छात्रों के मध्य की कड़ी शिक्षक ही होते है जो अबोध छात्रों के मानस-पटल पर शिक्षा को अंकुरित करते हैं। स्कूल में छात्रों की अनुपस्थिति भी शिक्षा ना प्राप्त करने का एक घटक हैं।

तालिका क्रमांक 3 में स्कूलों में अनुपस्थिति के कारणों को दर्शाया गया है जिनमें से अध्ययन में रूचि की कमी, स्वास्थ्य समस्या, अभिभावकों का व्यवहार, गरीबी तथा यातायात सुविधा का अभाव आदि प्रमुख है।  

तालिका -3

अनुपस्थित रहने के कारण

क्रमांक

कारण

आवृत्ति (F)

प्रतिशत (Percentage)

1

अध्ययन में रूचि की कमी

70

23.33

2

स्वास्थ्य की समस्या

80

26.67

3

अभिभावकों की प्रकृति (व्यवहार)

45

15.00

4

गरीबी

90

30.00

5

यातायात सुविधाओं की कमी

15

05.00

योग

300

100.00

           

तालिका क्रमांक 3 के विश्लेषण से प्रतीत होता है कि सर्वाधिक 30 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने गरीबी को प्रमुख कारण माना। गरीबी के कारण बच्चें बाल्यकाल से ही धनोपार्जन में लग जाते हैं जिससे स्कूलों में अनुपस्थित हो जाते हैं। अर्थात् स्कूल से अनुपस्थित रहने के मुख्य कारण ‘‘गरीबी’’ ही है। 26.67 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने खराब स्वास्थ्य से स्कूल में अनुपस्थित होने का कारण माना गरीबी, संतुलित आहार, अंध विश्वास तथा चिकित्सा सुविधाओं की कमी आदि कुछ वजह से आदिवासी बच्चों में बीमारियां होती है। 23.33 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने अध्ययन में रूचि की कमी को माना। जिसका कारण गरीबी का जीवन-यापन है। 15 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने अभिभावकों के व्यवहार को उत्तरदायी माना। उनका कहना है कि बच्चों के माता-पिता तत्काल लाभ को प्राथमिकता देते हैं जिससे बच्चों को स्कूल भेजने के बजाय धन-उपार्जन के कार्यों में भेज देते हैं।

 

संसाधनों की कमी, गरीबी, असंतुलित आहार, जलवायु परिस्थितियाँ, चिकित्सा सुविधाओं का अभाव, और अंध विश्वास- ये कुछ ऐसे कारण है जिनकी वजह से आदिवासी बच्चों में बार-बार बीमारियां होती हैं। जहाँ तक सरकार द्वारा प्रदान की जाने वाली सुविधाओं की जानकारी का प्रश्न है। तालिका क्रमांक 4 में विश्लेषित किया गया है।

तालिका - 4

शासकीय विज्ञापनों के प्रति जागरूकता

क्रमांक

विभिन्न शासकीय विज्ञापन

आवृत्ति (F)

प्रतिशत (Percentage)

1

शिक्षा छात्रवृत्ति

70

23-34

2

मूल सुविधायें

60

20-00

3

मध्याहन

60

20-00

4

निःशुल्क पुस्तकें

60

20-00

5

अन्य

50

16-67

योग

300

100-00

 

तालिका क्रमांक 4 के विश्लेषण से पता चलता है कि 23.34 प्रतिशत लोगों को छात्रवृत्ति के बारे में जानकारी थी। जबकि 20 प्रतिशत लोगों को मध्याहन भोजन तथा मूल सुविधाओं की जानकारी थी। इसी प्रकार से 20 प्रतिशत लोगों को निःशुल्क पुस्तकों के बारे में जानकारी थी शेष 16.67 प्रतिशत लोगो को अन्य सुविधायें यथा-मुफ्त चिकित्सा की जांच, मुफ्त वर्दी, तथा शिक्षा ग्रहण करने की अवधि में मुफ्त पुस्तकों के प्रदान करने की जानकारी थी।

सारांश:-

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 46 अनुसूचित जनजाति तथा अनुसूचित जाति के लोगो को शैक्षिक तथा आर्थिक व्यवस्था में सुधार लाने हेतु प्रकाश डालता है लेकिन विगत चार दशकों में अनुसूचित जनजातियों के शिक्षा के प्रसार में काफी असमानतायें पायी गई। प्रस्तुत अध्ययन से भी प्रतीत होता है कि अध्यायित क्षेत्र बस्तर के लोहांडीगुड़ा में भी जनजातियों की अज्ञानता तथा निरक्षरता को दूर करने हेतु कम प्रयास किये गये और जो भी प्रयास किये भी गये हैं वे या तो असफल रहे हैं अथवा प्रयास का प्रभाव अपेक्षाकृत कम ही रहा है। सरकारी प्रयास लक्ष्य से दूर हैं और गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा के लिये नये-नये लक्ष्यों को निर्मित किये जाने की आवश्यकता है। इस सम्बन्ध में कुछ सुझाव दिये जा सकते हैः-

(अ) जनजातीय छात्रों को उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा सुनिश्चित की जानी चाहिये।

(ब) प्राथमिक शिक्षा तथा आवासीय शिक्षा को सुदृढ़ किये जाने की आवश्यकता है।

(स) छात्रवृत्ति की दर में नियमित संशोधन किया जाये।

(द) जनजातीय क्षेत्रों में शासकीय प्रयास के साथ-साथ गैर सरकारी संगठनों के माध्यम से शिक्षा की नीतियों को जागरूकता लाने हेतु शिविर लगाये जायें जिसकी देख-रेख जिला-स्तर पर हो।

(र) शिक्षण-पद्धति, कार्य समय, विद्यालय के कामकाज और उपस्थित रजिस्टर से संबंधित मामलो में विद्यालयों के कामकाज की नियमित रूप से (जिला स्तर पर) ना कि निगरानी हो अपितु समय-समय पर जांच भी किये जाने की आवश्यकता है।

 

संदर्भ (Reference) :-

1.        विरियर एलविन, ए न्यू डील फॉर ट्राइबल इण्डिया, गृह मंत्रालय, भारत सरकार 1901, पृष्ठ-1.

2.        बेब्स, सेन्सस ऑफ इण्डिया 1981, पार्ट-1, सीरीज-1, पृष्ठ-1.

3.        धुरिये, जी.एस., ए आरिजिनल सो काल्ड देयर फ्यूटर 1943, किताब महल, देलही पेज-31.

4.        गिलिन और गिलिन, कल्चरल एन्थ्रोपोलोजी, न्यूयार्क, 1950, पेज-282.

5.        मजूमदार, रेसेज एण्ड कल्चर्स ऑफ इण्डिया, 1961, पेज 398.

6.        लिंटन, राल्फ, दि साइन्स ऑफ मैन, इन वर्ल्ड क्राइसेस कोलम्बिया यूनिवर्सिटी प्रेस 1945.

7.     Madhan, T.N. (1952), Education of Tribal India, Eastern Anthropologist, Oxford University Press, New Delhi.

8.     Vimal, P. Shah, Tara Patel (1948), Social Contexts of tribal education, naurang rai, Concept publishing company, Bali Nagar, New Delhi.

9.     Biswajit Ghosh (2011) Population change and its consequences : India’s concerns in the 21st century, Man and development centre for research in rural and industrial development, Vol. 33, No. 1, March, P.P. 1-18.

10.  Jakka Parthasarathy (2017), “Education and Development among the tribes – A study of Formal Education and Tribal Giri Child dropouts in the Nilgris Dristrict, Tamilnadu”, Tribal Education Status Documentation, Tribal Research Centre (TRC), Under the Hill Area Development program (HADP), Udhagamandalam, Nilgris, Tamilnadu.

11.  Census Report-2011, Govt. of India.



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