जनजातीय
हस्तशिल्प निर्माण एवं विपणन की प्रक्रिया (छत्तीसगढ़
राज्य बस्तर संभाग के विशेष सन्दर्भ में)
शिव कुमार सिंघल
शासकीय गुंडाधूर स्नातकोत्तर महाविद्यालय, कोंडागांव
सारांश : -
बस्तर संभाग में जनजातीय
हस्तशिल्प कलाओं के पीछे जनजातियों की संस्कृति, परंपरा
दृष्टिगोचर होती है। इस क्षेत्र की जनजातियां पूर्व में केवल पारंपरिक
पूजा-अनुष्ठान में उपयोगी कलाकृतियों का निर्माण किया करती थी, धीरे-धीरे बदलते परिवेश के अनुसार वर्तमान में जनजातियां अपनी पुरातन
अनुष्ठानीक कलाकृतियों के साथ दैनिक जीवन में उपयोगी वस्तुओं, साज-सज्जा संबंधी वस्तुओं का निर्माण कर उनमें बारीक नक्काशी करनी लगी है। इन
वस्तुओं/कलाकृतियों पर की जाने वाली नक्काशी जनजातियों के जीवन चरित्र का वर्णन
करती है। जनजातियों के द्वारा आदि काल से अपने पूर्वजों से सीखा गया ज्ञान, संस्कृति के प्रति समझ,
इनकी कलाकृतियों के माध्यम से देखी जा सकती है। बस्तर संभाग
की जनजातीय हस्तशिल्प वैश्विक स्तर पर ख्याति प्राप्त कर चुकी है इस संभाग में
जनजातियां हस्तशिल्प के निर्माण एवं विपणन के माध्यम से अर्थोपार्जन/जीविकोपार्जन
कर रही है।
बीज शब्द- जनजाति,
विपणन, हस्तशिल्प, असंगठित श्रेणी,
गैर-सरकारी संगठन,
सहकारी उपक्रम, प्रबंधन, पंचवर्षीय योजना,
वैश्वीकरण, एम्पोरियम, क्रय-शक्ति।
प्रस्तावनाः-
किसी वस्तु का निर्माण कई
उद्देश्यों की पूर्ति हेतु किया जा सकता है। इन उद्देश्यों की पूर्ति वस्तुओं की
उपयोगिता से संबंधित होती है। वस्तु का निर्माण इस वस्तु का उपयोग स्वयं के लिए
किसी दूसरे के लिए व विक्रय कर अर्थोपार्जन/जीविकोपार्जन के लिए किया जा सकता है।
क्रय-विक्रय का मुख्य उद्देश्य उन समस्त गतिविधियों से है जिसमें उत्पादक एवं
उपभोक्ताओं की आवश्यकताओं की पूर्ति होती हो। प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से
अपनी भौतिक आवश्यकता को पूर्ण कर संतुष्टि प्राप्त करना ही क्रय-विक्रय के बीच
संबंध को दर्शाता है। प्रायः उत्पादक द्वारा विक्रय एवं उपभोक्ता द्वारा क्रय किया
जाता है। क्रय एवं विक्रय आपस में जुड़े हुए है क्रय एवं विक्रय में उत्पादक एवं
उपभोक्ता का संबंध गहरा होता है। बिना उत्पादक के विक्रय नही हो सकता। उत्पादक
द्वारा अपनी आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ करने, आवश्यकताओं की पूर्ति करने
हेतु वस्तुओं का उत्पादन कर विक्रय किया जाता है, वहीं
उपभोक्ता द्वारा वस्तुओं के उपयोग हेतु दर्शाई गई इच्छा शक्ति को क्रय शक्ति कहा
जाता है। जनजातीय हस्तशिल्प संबंधी कलाकृतियों में क्रय-विक्रय अर्थात उत्पादक एवं
उपभोक्ता के बीच संबंध महत्वपूर्ण है। सहज-सरल जीवन, परिवार
में एकजूटता,
प्रकृति प्रेमी, अपने देवी - देवताओं के
प्रति पूर्ण निष्ठावान बस्तर क्षेत्र की जनजातियां बिना किसी फल के चिंता के
निरन्तर कर्म करती चली आ रही है। वर्तमान में जनजातियां, हस्तशिल्प संबंधी विभिन्न तरह की वस्तुओं/कलाकृतियों का निर्माण व इनके विक्रय
के माध्यम से अर्थोपार्जन कर रही है। बस्तर क्षेत्र का जनजातीय हस्तशिल्प आज
हस्तशिल्प उद्योग का रूप ले चुका है। कुटीर उद्योग के रूप में हस्तशिल्प संबंधी
कलाकृतियों/वस्तुओं का निर्माण किया जा रहा है। बस्तर क्षेत्र की जनजातीय कलाकृतियां
वर्तमान में राष्ट्रीय ही नही अपितु अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त कर
चुकी है।
आधुनिक शहरी समाज के
मानव से जब जनजातियों की बात की जाती है
तो वह जनजाति शब्द का अर्थ- पिछड़ेपन, अशिक्षित, जंगली,
देहाती से लगाता है जबकि जनजातियां भले ही अशिक्षित, कम पढ़ी-लिखी,
जंगलों-वनों में रहने वाली ही क्यों न हो परंतु इनका
पारंपरिक ज्ञान का भंडार,
इनका जीवन अनुभव अतुलनीय है।
शोध का उद्देश्य: - प्रस्तुत शोध का उद्देश्य निम्नलिखित है-
1.
बस्तर संभाग में जनजातीय हस्तशिल्प का जनजातीय शिल्पकारो से रुझान जानना।
2.
जनजातीय शिल्पकला बस्तर संभाग में जनजातियों को किस तरह अर्थोपार्जन/जीविकोपार्जन
में सहयोग कर रही है यह जानना।
3.
बस्तर संभाग में जनजातीय शिल्पकला के निर्माण-विपणन की प्रक्रिया को समझना।
4.
शिल्पकला जनजातीय जीवन में क्या महत्व रखती है इसे जानना।
शोध
हेतु परिकल्पनाः - शोध हेतु परिकल्पना कि गई है कि -
01. वर्तमान समय में बस्तर
संभाग के जनजातीय शिल्पकार विभिन्न प्रकारों के शिल्पकला का निर्माण इनका विपणन कर
अर्थोपार्जन/जीविकोपार्जन कर रही है जिससे इनके जीवन स्तर में सुधार हुआ है।
02. बस्तर संभाग में
शिल्पकला के लघु उद्योग के रूप में विकसित होंने की अपार संभावनाएं है।
अनुसंधान अभिकल्प एवं प्रविधि- प्रस्तुत शोध गुणात्मक एवं मात्रात्मक अनुसंधान पर आधारित
है आकड़ो के संकलन एवं विश्लेषण हेतु प्राथमिक एवं द्वितीयक आकड़ों का उपयोग किया
गया है।
अध्ययन का क्षेत्र- प्रस्तुत शोध बस्तर संभाग के सात जिलों- कोण्डागांव, नारायणपुर, बस्तर, कांकेर, बीजापुर, सुकमा, दंतेवाड़ा के जनजातीय
शिल्पकारो के घड़वा शिल्प, बांस शिल्प, पत्थर शिल्प, काष्ठ शिल्प, तुम्बा शिल्प, गोदना शिल्प के अध्ययन पर
आधारित है।
जनजातीय हस्तशिल्प में
क्रय से तात्पर्य कई प्रकारो से लगाया जा सकता है
-
जनजातीय हस्तशिल्प निर्माण
हेतु कच्चे माल (सामग्री) का क्रय करना -
हस्तशिल्प निर्माण हेतु
जनजातियों के द्वारा कच्चे माल का संग्रहन निम्न माध्यमों से किया जाता है -
1- वन/जंगलों के माध्यम से - छत्तीसगढ़ का बस्तर संभाग
जनजातीय बहुल क्षेत्र होने के साथ संघन वन/जंगलों से घिरा क्षेत्र भी है। वनों से
प्राप्त होने वाली कच्ची सामग्री जिसका उपयोग हस्तशिल्प कलाकृतियों के निर्माण में
किया जाता है निम्न है- मिट्टी, लकड़ी, पत्थर, मोम, पत्ते,
बांस, शीशल, कोसा
आदि।
2- बाजारों से कच्चे माल (सामग्री) के क्रय के माध्यम से - जनजातीय हस्तशिल्पकार हस्तशिल्प निर्माण में प्रयुक्त कच्ची सामग्री
जंगलों/वनों से संग्रहित करने के अलावा स्थानीय बाजारों के माध्यम से भी क्रय करती
है।
3- गैर-सरकारी संगठनों के माध्यम से सहायता -
जनजातियों के द्वारा हस्तशिल्प कलाकृतियों के निर्माण हेतु आवश्यक सामग्री जैसे-
पीतल, तांबा,
मोम,
मिट्टी, काष्ठ आदि मुफ्त अथवा सस्से दामों पर
हस्तशिल्पकारों को उपलब्ध कराई जाती है।
4- सरकारी संस्थाओं के माध्यम से सहायता -
विभिन्न सरकारी संस्थाओं के माध्यम से जनजातीय हस्तशिल्पकारों को हस्तशिल्प
वस्तुओं/कलाकृतियों के निर्माण हेतु सस्से दामों अथवा मुफ्त में हस्तशिल्प निर्माण
हेतु कच्चा माल उपलब्ध कराया जाता है।
जनजातीय हस्तशिल्पकारों
द्वारा कच्चा माल एकत्रित करने में आने वाली परेशानियां :-
1. जंगलों/वनों
के संरक्षण हेतु लगे प्रतिबंधो का असर हस्तशिल्प निर्माण हेतु उपयोगी कच्चे
सामग्री के संग्रहन पर पड़ता है, जिससे हस्तशिल्प कलाकृतियों का निर्माण
प्रभावित होता है।
2. विभिन्न
सरकारी/गैर-सरकारी संस्थाओं द्वारा दी जाने वाली सामग्री की गुणवत्ता निम्न होने
के कारण जनजातीय हस्तशिल्पकारों को कलाकृतियों के निर्माण में दिक्कते आती है।
3. जनजातीय
घढ़वा हस्तशिल्पकारों द्वारा कलाकृतियों के निर्माण में लगने वाली कच्ची सामग्री की
आपूर्ति निम्न स्तर के होने व कीमत काफी अधिक होने से हस्तशिल्प निर्माण प्रक्रिया
प्रभावित होती है।
4. हस्तशिल्प
निर्माण सामग्री की बाजार कीमतों में समयानुसार वृद्धि होती रहती है जिस कारण
जनजातीय हस्तशिल्पकारों को बाजार मूल्य पर कच्चा माल खरीदने में आर्थिक परेशानियां
होती है।
5. विभिन्न
सरकारी योजनाओं के माध्यम से हस्तशिल्पकारों को कच्चा माल उपलब्ध कराया जाता है
पंरतु जानकारी के अभाव, अज्ञानतावश जनजातीय
हस्तशिल्पकार लाभ नही ले पाती।
बस्तर संभाग में जनजातीय
हस्तशिल्पकारों द्वारा कलाकृतियों/वस्तुओं का निर्माण कई माध्यमों से किया जाता है
-
1- असंगठित रूप से - देश की अर्थव्यवस्था में 50 प्रतिशत से अधिक का योगदान करने वाले अंसंगठित क्षेत्र के लोगों का कुल कार्यबल में हिस्सा 80 प्रतिशत लगभग है। असंगठित क्षेत्र मूल रूप से ग्रामीण आबादी से बना है व इस
असंगठित क्षेत्र में वें लोग शामिल है जो गांव में रहकर परंपरागत कार्य किया करते
है।
2- संगठित रूप से - संगठित रूप का तात्पर्य संगठन में
कार्य करना होता है। बस्तर क्षेत्र में जनजातीय हस्तशिल्पकार संगठन/समूह में भी
हस्तशिल्प कलाकृतियों/वस्तुओं का निर्माण करती है।
संगठित रूप से जनजातीय
हस्तशिल्पों का निर्माण कई माध्यमों में किया जाता है
2.1- समूह बनाकर - इस तरह का समूह स्वयं-सहायता समूह, सहकारिता समूह के रूप में हो सकती है।
(अ) स्वयं-सहायता समूह बनाकर हस्तशिल्प कलाकृतियों/वस्तुओं का निर्माण - स्वयं-सहायता समूह जमीनी स्तर पर जन-सामान्य के आर्थिक सशक्तिकरण का एक
प्रमुख माध्यम है। स्वयं सहायता समूह में 5-20 सदस्य हो सकते है।
(ब) सहकारिता समिति बनाकर हस्तशिल्प कलाकृतियों/वस्तुओं का निर्माण - सहकारी शब्द का अर्थ “साथ मिलकर कार्य करना”
होता है। यह लोगों का एक ऐसा संघ होता है जो पारस्परिक लाभ
(सामाजिक,
आर्थिक, सांस्कृतिक) के लिए स्वेच्छापूर्वक
सहयोग करते है।
छत्तीसगढ़ बस्तर संभाग में
हस्तशिल्प कलाओं के उत्पादन एवं विक्रय हेतु हस्तशिल्पकारों के द्वारा उत्पादक एवं
सहकारी विपणन समितियां बनाई गई है।
तालिका
क्र. 1
छत्तीसगढ़
राज्य में निम्न प्रकार की सहकारी समितियां स्थित है-
|
क्र.
|
सहकारी समिति का
नाम एवं पंजीयन संख्या
|
कार्य क्षेत्र
|
|
01
|
काष्ठ हस्तशिल्प
कला समिति,
जिला बस्तर (छत्तीसगढ़)REG. NO.- C-13011/59/2001-C(WR)
|
बस्तर जिला, छत्तीसगढ़ काष्ठ शिल्प
|
|
02
|
मैं साथी समाज
सेवा संस्था,
कोण्डागांव, जिला-कोण्डागांव
(छत्तीसगढ़)REG.
NO.- C-130-C/2001-C(WR)
|
कोण्डागांव, नारायणपुर,
कांकेर बस्तर रफ-आयरन, बेलमेटल, टेराकोटा
|
|
03
|
नेहरू युवा
केन्द्र रायगढ़ (छत्तीसगढ़)REG. NO.- C-13011/66/2001-C(WR)
|
रायगढ़ जिले के
पंन्द्रह गांव,
बांस हस्तशिल्प
|
|
04
|
लहर समाज सेवी
संस्था,
चांपा (छत्तीसगढ़)REG. NO.- C-13011/70/2001-C(WR)
|
चांपा, चोरिया,
चंद्रपुर
|
|
05
|
छत्तीसगढ़ खादी
एवं ग्राम उद्योग बोर्ड,
रायगढ़ REG. NO.- C-13011/78/2001-C(WR)
|
कोण्डागांव, जगदलपुर,
जांजगीर-चांपा
|
|
06
|
सोसाइटी फॉर
इकोनॉमी एंड सोशल स्टडीज,
साकेत नई-दिल्ली -110017 REG. NO.- C-13011/79/2001-C(WR)
|
कांकेर, बालोद
|
स्त्रोत
- राष्ट्रीय हस्तशिल्प पुरस्कार प्राप्त राजेंद्र बघेल(घड़वा
शिल्पकार,
निवासी-भेलवापदर पारा,जिला- कोंडागांव) से
प्राप्त जानकारी,
साक्षात्कार दिनांक 06/03/2025
2.2- गैर-सरकारी
संगठन के माध्यम से जनजातीय हस्तशिल्प कलाकृतियों का निर्माण -
गैर-सरकारी संगठन एक निजी
संगठन होता है जिसके द्वारा निर्धनों के हितो की रक्षा, दुख-दर्द कम करने,
बुनियादी सामाजिक सेवाएं
प्रदान करने एवं सामुदायिक विकास
के लिए गतिविधियां चलाई जाती है। संगठन के
द्वारा प्राप्त लाभ को संगठन के कार्यो में लगाया जाता है, यह कार्य सार्वजनिक उद्देश्य को लक्षित करते है।
तालिका
क्र.
2
बस्तर
संभाग में निम्न प्रकार की गैर-सरकारी संगठन स्थित है-
|
क्र.
|
गैर-सरकारी संगठन/संस्था का नाम
|
कार्य क्षेत्र
|
|
01
|
साथी समाज सेवी संस्था, कोण्डागांव, जिला-कोण्डागांव (छत्तीसगढ़)
नीव रखी- सन् 1989 श्री भूपेश तिवारी
कई उद्देश्यों को लेकर कार्य किया जा रहा है-
1. तननीकी विकास
2. डिजाइन विकास
3. विपणन तकनीकी
4. सामाजिक सुरक्षा शिक्षण तकनीकी
|
बस्तर क्षेत्र जिनमें कोण्डागांव, नारायणपुर, कांकेर आदि शामिल है।
|
|
02
|
पारंपरिक बस्तर शिल्प परिवार
नीव रखी- 1985 स्व. जयदेव बघेल
(वर्तमान में कार्यशील पूंजी की कमी के कारण बंद)
|
बस्तर क्षेत्र जैसे- कोण्डागांव, नारायणपुर
|
स्त्रोत-
साथी गैर-सरकारी संगठन जिला-कोण्डागांव एवं जनजातीय
हस्तशिल्पकारों से प्राप्त जानकारी
2.3- सरकारी
संस्थाओं के माध्यम से हस्तशिल्प कलाकृतियों का निर्माण -
विभिन्न सरकारी संस्थाओं
के द्वारा हस्तशिल्प के क्षेत्र में प्रशिक्षण कार्य कराया जाता है। इस तरह की
संस्थाएं शिल्पकारों के माध्यम से विभिन्न तरह की हस्तशिल्प कलाकृतियों का निर्माण
भी करवाती है। निर्मित हस्तशिल्प कलाकृतियों को राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर निर्यात किया जाता है एवं प्राप्त लाभ के कुछ हिस्से
से जनजातीय हस्तशिल्पकारों को लाभान्वित किया जाता है।
तालिका
क्र. 3
छत्तीसगढ़
राज्य में निम्न प्रकार की सरकारी संस्थाए कार्यरत है-
|
क्र.
|
सरकारी संस्थाओं के नाम
|
कार्य क्षेत्र
|
|
01
|
छ.ग. राज्य हस्तशिल्प विकास बोर्ड, छत्तीसगढ़
|
छत्तीसगढ़ राज्य
|
|
02
|
जिला पंचायत
|
जिला स्तर पर
|
|
03
|
डी.आर.सी. जगदलपुर
|
बस्तर क्षेत्र
|
|
04
|
डी.सी.एच.
|
बस्तर क्षेत्र
|
|
05
|
मध्यप्रदेश हस्तशिल्प विकास निगम
|
बस्तर क्षेत्र
|
|
06
|
भारत सरकार कपड़ा मंत्रालय
|
छत्तीसगढ़ राज्य
|
स्त्रोत-
साथी गैर-सरकारी संगठन जिला-कोण्डागांव एवं जनजातीय
हस्तशिल्पकारों से प्राप्त जानकारी
विपणन व्यवस्था -
प्रो. हेन्सन के शब्दों में- ”विपणन
उपभोक्ताओं की आवश्यकताओं की खोज करने एवं उन्हे वस्तुओं, सेवाओं की विशेषताओं में निष्पादन करने की क्रिया है, जिससे वस्तुओं एवं सेवाओं की मांग उत्पन्न की जाती है जिससे मांग में वृद्धि
हो सके।
मिचले के शब्दों में- ”विपनण
वह प्रक्रिया है जिसमें वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन से उपयोग तक को शामिल किया
जाता हो"
बस्तर संभाग में
हस्तशिल्प के विपणन
की व्यवस्था ही
जनजातीय हस्तशिल्प कलाकारों को
अर्थोपार्जन करने में
सहायता प्रदान करती हैआरेख
क्र. 1 - वस्तुओं/कलाकृतियों की विपणन प्रक्रिया
स्त्रोत-
बस्तर क्षेत्र मे हस्तशिल्पकला के अध्ययन के दौरान प्राप्त
जानकारी
तालिका
क्र. 4
ग्यारहवीं
पंचवर्षीय योजना में हस्तशिल्प जनगणना के अनुसार कारीगरों की कुल जनसंख्या एवं कुल
जनसंख्या में जातिवार कारीगरों की जनसंख्या का विवरण -
|
भारत में ग्यारहवी पंचवर्षीय योजना में संचालित जनगणना के अनुसार कुल कारीगर
जनसंख्या
|
कुल कारीगर जनसंख्या में पुरूष कारीगर जनसंख्या
|
कुल कारीगर जनसंख्या में महिला कारीगर जनसंख्या
|
कुल कारीगर जनसंख्या में वर्ग वार जनसंख्या
|
|
अ.जा.
|
अ.ज.जा.
|
पि.वर्ग
|
सामान्य
|
|
जनसंख्या
|
68,79,114
|
30,20,888
|
38,65,111
|
14,32,288
|
5,16,450
|
36,08,264
|
13,22,112
|
|
प्रतिशत
|
100%
|
43.87%
|
56.13%
|
20.8%
|
7.5%
|
52.4%
|
19.2%
|
स्त्रोत-
handicrafts.nic.in
हस्तशिल्प के निर्यातक
होने के कई कारण है-
1. कम पूंजी निवेश 2. मूल्य संवर्धन 3.
उच्च गुणवत्ता
विदेशी पर्यटकों की पहली
पसंद छत्तीसगढ़ बस्तर संभाग की कलाकृतियां -
छत्तीसगढ़ बस्तर संभाग
जनजातीय हस्तशिल्प कला का गढ़ है, यहां बसने वाली जनजातियां विभिन्न
प्रकारों के हस्तशिल्प जिसमें- घढ़वा (बेलमेटल) कला, काष्ठ
कला, मिट्टी कला,
लोह शिल्प, पत्थर शिल्प आदि शामिल है का निर्माण
करती है। मशीनी युग में भी जनजातियां पारंपरिक तरिकों के माध्यम से हस्तशिल्प
कलाकृतियों/वस्तुओं का निर्माण करना पसंद करती है
जिस कारण इन वस्तुओं की मौलिकता बनी रहती है। बस्तर क्षेत्र में बनी
जनजातीय हस्तशिल्प में सर्वाधिक घढ़वा कला, काष्ठ कला, लोह शिल्प,
बांस शिल्प का निर्यात प्रमुखता से किया जाता है। बस्तर
क्षेत्र में बनी भारी-भरकम कलाकृतियां भी विदेशों में भेजी जा रही है। कई
प्रतिमाओं का वनज क्विंटल से भी अधिक होता है।
जनजातीय हस्तशिल्प कलाओं
के क्रय-विक्रय की प्रक्रियां -
जनजातीय हस्तशिल्प
कलाकृतियों की क्रय-विक्रय की प्रक्रिया को चार भागों में बांटा जा सकता है-
1-
स्थानीय स्तर पर - जनजातीय हस्तशिल्पियों द्वारा निर्मित
विभिन्न तरह की कलाकृतियों का क्रय स्थानीय बाजारों में, हाट मेलें,
प्रदर्शनियों के द्वारा, त्यौहारों में उपभोक्ता
द्वारा किया जाता है।
2- राजकीय
स्तर पर - शासन/प्रशासन के द्वारा जनजातीय हस्तशिल्प कलाकृतियों / वस्तुओं के विक्रय हेतु योजनाएं
बनाई जाती है। राजकीय स्तर पर थोक व्यापारी, फुटकर व्यापारी, एम्पोरियम,
बिचौलियों के द्वारा शिल्पियों से हस्तशिल्प कलाकृतियों की
खरीद कर उपभोक्ताओं को विक्रय की जाती है।
2.1- दिल्ली
आर्ट-गैलरी के माध्यम से हस्तशिल्प वस्तुओं/कलाकृतियों का विक्रय - जनजातियों द्वारा निर्मित विभिन्न तरह की हस्तशिल्प कलाएं/कलाकृतियां इस
आर्ट-गैलरी की खासियत है। देश-विदेश के उपभोक्ता इस आर्ट गैलरी में पहुंच जनजातीय
हस्तशिल्प कलाकृतियों का क्रय करती है।
2.2- बैंगलूर
आर्ट-गैलरी के माध्यम से - भारत के बैंगलूर में
स्थित आर्ट-गैलरी के माध्यम से जनजातीय हस्तशिल्प कलाकृतियों का बड़ी संख्या में
विक्रय किया जाता है।
2.3- शबरी
एम्पोरियम के माध्यम से विक्रय - देश के कई स्थानों पर
हस्तशिल्प कला के विक्रय हेतु एम्पोरियम की स्थापना की गई है। दिल्ली, गुजरात आदि बड़े शहरों में इन एम्पोरियम के माध्यम से जनजातीय हस्तशिल्प
कला/वस्तुओं को उपभोक्ता द्वारा खरीदा जा सकता है।
तालिका क्र. 5
|
क्र.
|
एम्पोरियम का नाम
|
फोन नम्बर
|
|
01
|
शबरी एम्पोरियम,
छत्तीसगढ़ हाट, पंडरी, रायपुर
|
0771-2229947
|
|
02
|
शबरी एम्पोरियम,
सुन्दर नगर रोड, आमापारा, रायपुर
|
0771-4094459
|
|
03
|
शबरी एम्पोरियम,
माना एयरपोर्ट, रायपुर
|
0771-2418981
|
|
04
|
शबरी एम्पोरियम,
सिविक सेन्टर, भिलाई
|
0788-2261534
|
|
05
|
शबरी एम्पोरियम,
30 कोण्डागांव, बस्तर
|
08817377800
|
|
06
|
शबरी एम्पोरियम,
परचनपाल, बस्तर
|
07782-262478
|
|
07
|
शबरी एम्पोरियम,
चांदनी चौक, जगदलपुर
|
07782-222579
|
|
08
|
शबरी एम्पोरियम,
बस स्टैण्ड, नारायणपुर
|
09424189750
|
|
09
|
शबरी एम्पोरियम,
आकाशवाणी चौक, अंबिकापुर
|
07774-222650
|
|
10
|
शबरी एम्पोरियम,
राजीव गांधी हस्तशिल्प भवन, कनाट पैलेस,
नई दिल्ली
|
011-23358501
|
|
11
|
शबरी एम्पोरियम,
शाप नंबर-83 सी हैण्डलूम
हवेली, अम्बावाड़ी,
अहमदाबाद
|
07930007621
|
|
12
|
शबरी एम्पोरियम,
बी.डी.ए. काम्प्लेक्स 36 दसालबंद,
बिलासपुर
|
07752-417963
|
|
13
|
शबरी एम्पोरियम,
श्री बैठक जी मंदिर रोड चम्पारण, रायपुर
|
07389474926
|
|
14
|
शबरी एम्पोरियम,
कलेक्टोरेट कैंपस, राजनांदगांव
|
09827408287
|
|
15
|
मोबाईल शबरी एम्पोरियम
|
09424242538
|
|
16
|
शबरी एम्पोरियम,
पुरखौती मुक्तांगन, नई राजधानी, रायपुर
|
09993780645
|
|
17
|
शबरी एम्पोरियम,
सन्ना रोड, महाराजा चौक, जशपुर
|
07763-223440
|
|
18
|
शबरी एम्पोरियम,
कालीन प्रशिक्षण सह उत्पादन केन्द्र कम्लेश्वरपुर, मैनपाट,
सरगुजा
|
09425580265
|
स्त्रोत
- छत्तीसगढ़ हस्तशिल्प विकास बोर्ड, रायपुर (छत्तीसगढ़)
2.4- खुदरा
क्रेताओं के माध्यम से हस्तशिल्प उत्पादों का उपभोक्ताओं द्वारा क्रय किया जाता
है- बस्तर संभाग में जनजातियों द्वारा उत्पादित हस्तशिल्प
कलाकृतियों/वस्तुओं का क्रय खुदरा क्रेता प्रत्यक्ष रूप से करते है व इन हस्तशिल्प
कलाकृतियों का विक्रय प्रदर्शनियों, मेलों की व्यवस्था कर की
जाती है।
2.5- थोक
व्यापारी के माध्यम से जनजातीय हस्तशिल्प कलाकृतियों/वस्तुओं का विक्रय- थोक व्यापारियों के द्वारा भी जनजातीय हस्तशिल्प उत्पादों का बढ़ी मात्रा में
क्रय किया जाता है।
2.6- ई-व्यापार
के द्वारा हस्तशिल्प उत्पादों/कलाकृतियों का विक्रय -
इंटरनेट, ई-व्यापार ने वैश्विक स्तर पर पहचान बनाई है। राष्ट्रीय उपभोक्ता ही नही अपितु
अंतर्राष्ट्रीय उपभोक्ता किसी देश में रहते हुए भी वह अपनी पसंद की
कलाकृति/वस्तुओं का क्रय कर सकता है।
3-
अतंर्राष्ट्रीय स्तर पर हस्तशिल्प कलाकृतियों का विक्रय - जनजातीय हस्तशिल्प कलाकृतियों/वस्तुओं का विक्रय अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हो
सके इसकी व्यवस्था शासन/प्रशासन के द्वारा की जाती है।
4-
हस्तशिल्प निर्यात संवर्धन परिषद् - हस्तशिल्प निर्यात
संवर्धन परिषद (Export
Promotion Council for Handicrafts ‘’EPCH’’) कंपनी
अधिनियम के अनुसार वर्ष 1986-87 में स्थापित हुई थी। यह एक गैर लाभकारी संगठन है इसका मुख्य उद्देश्य
हस्तशिल्प निर्यात को बढ़ावा देना, समर्थन, संरक्षण, संभालना व वृद्धि करना है।
बस्तर क्षेत्र के जनजातीय
हस्तशिल्प कला को मिला भौगोलिक संकेतक (Geographical Indication) का दर्जा :
-
भौगोलिक संकेतक (Geographical
Indication) भारत के संसद ने 1999 में रजिस्ट्रेशन एवं प्रोटेक्शन के तहत “जियोग्राफिकल इंडिकेशंस ऑफ
गुडस” भौगोलिक संकेतक को लागू किया था। इस अधिनियम के अन्तर्गत भारत के किसी क्षेत्र
में पाई जाने वाली विशिष्ट वस्तु का कानूनी अधिकार उस राज्य को दे दिया जाता है।
दूसरे शब्दों में जी.आई. टैग या भौगोलिक संकेतक किसी उत्पाद हेतु एक प्रतीक चिन्ह
है। भौगोलिक संकेतक किसी विशेष भौगोलिक उत्पत्ति, विशेष
गुणवत्ता व पहचान के आधार पर दिया जाता है। भौगोलिक संकेतक उस विशिष्ट उत्पाद की
गुणवत्ता एवं विशेषता को दर्शाता है। छत्तीसगढ़ राज्य बस्तर संभाग के तीन हस्तशिल्प
बस्तर ढोकरा(घड़वा)
शिल्प, लोह एवं काष्ठ शिल्प को भौगोलिक
संकेतक के रूप में मान्यता दी गई है।
निष्कर्ष:-
छत्तीसगढ़ राज्य बस्तर
संभाग की जनजातीय हस्तशिल्प भारत की सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक धरोहर है, वर्त्तमान समय में जनजातियां कृषि, मजदूरी, लघु वनोपज के संग्रहण के अलावा विभिन्न प्रकारो के हस्तशिल्प कलाकृतियों का
निर्माण एवं इनके विक्रय के माध्यम से अर्थोपार्जन/जीविकोपार्जन कर रही है,
आवश्यकता है जनजातीय हस्तशिल्प को और अधिक प्रोत्साहन देने की, हस्तशिल्प से सम्बंधित योजनाओं के सफल क्रियान्वयन की जिससे इस क्षेत्र में
जनजातीय शिल्पकला पूर्ण रूपेण लघु उद्योग का रूप ले सके जिसका सीधा लाभ यहाँ के
स्थानीय जनजातीय शिल्पकारो को होगा ।
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06/03/2025
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