भोजपुरी लोक संस्कृति के सन्दर्भ में
लोक परम्पराओं का अध्ययन
वर्षा
रानी 1*
1 द.आई.सी.एफ.ए.आई.
विश्वविद्यालय, रायपुर (छ.ग.)
संक्षेपिका - भोजपुरी लोक संस्कृति व्यापक है, यह मानव जीवन के हर पहलू में समाहित है।
यह व्यक्ति के जीवन को सुसंस्कृत एवं सुंदरता प्रदान करती है। विधि-विधान, जीवन
जीने के साधन बन गये हैं। मानव को सुसंस्कृत जीवन हेतु मकान निर्माण, महल एवं किला, गांवों का
निर्माण, भोजन, शिक्षा, साज-सज्जा, पहनावा, विभिन्न प्रकार के व्यवसाय जैसे पशु-पालन और शासन व्यवस्था
आदि जीवन से संबंधित सांस्कृतिक झलक से गुंथे हैं। लोक परम्परा के अंतर्गत
संस्कृति से संदर्भित पहलुओं पर विचार किया जाता है। जिसमें जीवन शैली, जीविका के
तरीके, विकास के सांस्कृतिक आयाम, पहचान के रूप
में संस्कृति, लोक साहित्य, धार्मिक कृत्य के अध्ययन, पुराणों, मौखिक परंपरा, सामाजिक आर्थिक
नजरिया, समुदायों की कलात्मक परिपाटी आदि सम्मिलित होती हैं। साथ ही लोक
परंपरा में भोजपुर की लोक शैलियाँ, लोक विधि-विधान,
रीति-रिवाज, त्यौहार मनाने
की विभिन्न पद्धतियाँ अनेक प्रकार के पारम्परिक खेल आदि को वर्णित किया जाता है।
भोजपुर अंचल में विभिन्न जाति धर्म के लोग रहते हैं। उनके रीति-रिवाज, त्यौहार
कार्यक्रमों का आयोजन, लोक-व्यवहार, सामाजिक व्यवस्था,
संगीत, कृषक जीवन-शैली, रूढ़ियाँ आदि का
अध्ययन किया जाता है। भोजपुरी लोक परम्पराओं में चउक चन्दा, साँझा पाराती, जलुआ,
जातीय परंपरा, सिंदूर, नाग-पूजा, शीतला माई, घरौंदा, कोठिला, कपड़ों से निर्मित
खिलौने, आभूषण, पानपत्ता, पचकोसी मेला, चैता, गंवई रंगमंच आदि का विशेष स्थान है।
कुंजी शब्द –
संस्कृति, संस्कार, लोक-परम्परा, लोक साहित्य, विधि-विधान, लोक-व्यवहार, रीति-रिवाज,
जलुआ, कोठिला, पानपत्ता, धार्मिक कृत्य,
चित्रकला ।
संस्कृति शब्द ‘कृ‘ धातु से बना है जिसमें सम् और कृति दो शब्द हैं | संस्कृति
शब्द का अर्थ होता है संस्कार किया हुआ,
पालिश किया हुआ अथवा दोष रहित यानि
त्रुटियों को निकालकर शुद्ध किया हुआ। सम् और कार से ‘संस्कार’ शब्द की निष्पति
होती है। अतः संस्कार शब्द का अर्थ है कि किसी भी वस्तु का संशोधन करना, परिष्कार
करना अथवा उत्तम बनाना। संस्कृति शब्द ‘कल्चर’ शब्द का पर्याय है। कल्चर शब्द की
व्युत्पत्ति लैटिन भाषा के ‘कोलर‘ धातु से निकली कुल्टश शब्द से हुई है जिसका अर्थ पूजा करना
एवं कृषि कार्य करना होता है। संस्कृति का अर्थ किसी समाज के वे सूक्ष्म संस्कार
हैं जिनके माध्यम से लोग परस्पर सम्प्रेषण करते हैं, विचार करते हैं और जीवन के
विषय में अपनी अभिवृत्तियों और ज्ञान को दिशा देते हैं। संस्कृति हमारे जीवन जीने
और सोचने की विधि में अन्तस्थ प्रकृति की अभिव्यक्ति है। परंपरा का अर्थ है
विश्वासों, रीति-रिवाज और व्यवहारों की वह प्रणाली जो किसी समूह या समाज में पीढ़ी
दर पीढ़ी बिना किसी व्यवधान के चली आ रही है । यह एक ऐसी विधि है जो लम्बे समय से
चली आ रही है और जिसका एक प्रतीकात्मक या विशेष महत्व होता है । परम्पराएँ न केवल
मनोरंजन का साधन हैं, बल्कि ये भोजपुरी समाज के मूल्यों को दर्शाती हैं और उन्हें
एक विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान देती हैं । परम्पराएँ संस्कृति का संरक्षण, सामाजिक जुडाव,
कलात्मक अभिव्यक्ति, भाषा विकास, साहित्य स्श्रोत, प्रकृति से जुडाव एवं ऐतिहासिक
जानकारी प्रदान करती हैं। भोजपुरी लोक परंपराएँ उत्तर प्रदेश और बिहार के भोजपुरी
क्षेत्र में रहने वाले लोगों की जीवन शैली और संस्कृति का अभिन्न अंग हैं। भोजपुरी
लोक परम्पराओं का अध्ययन करने से हमें भोजपुरी संस्कृति की समृद्धि और विविधता का
पता चलता है। कुछ भोजपुरी लोक परम्पराओं का वर्णन यहाँ पर किया गया है।
चउक
चन्दा-
भोजपुर क्षेत्र में शुक्ल पक्ष की
चौथ की तिथि अनेक प्रकार से लोक जीवन में प्रसिद्ध है। इस तिथि को गणेश जी का जन्म
होता है, जिसके कारण इसे गणेश चौथ के नाम से जानते हैं, लोग घर में गणेश
जी की पूजा अर्चना करते हैं। इसी दिन को चउक-चन्दा के रूप में गुरु शिष्य के
सम्मान में यह दिन प्रसिद्ध है जो आज शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है।
धीरे-धीरे यह परंपरा समाप्त होती जा रही है, गणेश चौथ को स्कूलों में गणेश पूजा के साथ मनाया जाता है, बच्चे इकट्ठा
होकर एक प्रकार का गाना गाते हैं ।
साँझा पाराती- संध्या
के समय सभी महिलाओं के द्वारा एक साथ गीत गाने की परंपरा है। यह गीत किसी बुजुर्ग महिला
के मुख से शुरू कर समूह की सभी महिलाओं के द्वारा स्तुति के रूप में गाया जाता है।
सभी जगहों पर शादी ब्याह गीत प्रारंभ करने से शुरुआत साँझा माई के गीतों से किये
जाने की परंपरा संपूर्ण भोजपुर लोक जीवन में प्रसिद्ध है। साँझा माई के रूप सौंदर्य
को गीत के माध्यम से विश्लेषित किया जाता है। किसी अवसर पर गाये जाने वाले गीतों
के पहले सांझा माई के गीत गाने की परंपरा है, ऐसा माना जाता
है कि किसी कार्य की सफलता हेतु देव स्तुति आवश्यक है एक गीत प्रस्तुत है-
“एनही रउरा पूछेले कवन बाबा हो कइसे-कइसे जगलड।
एनतिये-परनतिये-छरनतिये डुगिया बजवले
तब हम जगनी।“
जलुआ- शादी के लिए दूल्हा तैयार होता है तभी घर के सदस्य दादी माँ, भाभी, बहन और सगे
संबंधी आदि के साथ पड़ोसी, गलियों के लोग सभी इकट्ठे होते हैं। दूल्हा पालकी में बैठा
रहता है सभी स्त्रियाँ मिलकर एक प्रकार का गीत गाती है। माँ एवं बहने अपने आँचल से
चावल एवं पैसा प्रसन्न होकर लुटा रही हैं। यह बड़े ही प्रसन्नता का वातावरण रहता
है। जब दूल्हा शादी के लिए ससुराल को विदा हो जाता है तब महिलाएँ हरीस( लकड़ी का
हल) के पास खड़े होकर दूल्हे के शारीरिक साज-सज्जा सामग्री से संबंधित गीत गाती हैं।
गीत प्रस्तुत है-
“केनिया से आवेला बुकवा हरि झूमरी
केनिया के आवेला अबीर हो खेलब हरि
झूमरी
पूरब से आवेला बुकवा हरी झूमरी
पछिन से आवेला अबीर हो खेलब हरि
झूमरी”
जातीय
परंपरा-
समाज में कई जातियाँ पायी जाती हैं।
सभी सांस्कृतिक अवसरों में जातिगत सहभागिता दिखती है, जिससे समाज में
एकजुटता बनी रहती है एवं कोई व्यक्ति बेरोजगार नहीं रहता है। सभी जातियों का
अपना-अपना काम है। दैनिक जीवन में उत्सव,
व्रत-पर्व, आयोजन आदि में सामूहिकता
के दर्शन होते हैं, किन्तु शादी ब्याह में विभिन्न लोगों की सहभागिता को लेकर
सामूहिक परंपराओं को चित्रित कर सकते हैं।
सिंदूर- हिन्दू धर्म के सभी अनुष्ठानों में सिंदूर का अपना विशेष
महत्व है चाहे पूजा पाठ में हो, देवी-देवताओं के श्रृंगार में हो या फिर शादी ब्याह में।
दुर्गा पूजा, काली, शिव-पार्वती, लक्ष्मी आदि की पूजा के बाद सभी सुहागिनियां एक-दूसरे को
सिंदूर लगाती हैं और लम्बे समय तक सुहागिन बने रहने की कामना करती हैं । कुछ
मान्यताएँ प्रचलित हैं कि सिंदूर का आगमन आर्यो के द्वारा किया गया है। आर्य के
द्वारा अनार्य लोगों को सिंदूर लगाने एवं अन्य परंपराएँ मिली। दूसरी ओर मान्यता है
कि शादी के प्रतीक के रूप में सिंदूर लगाने की पंरपरा है। शरीर को आकर्षक एवं तेजमय
बनाने एवं सुहागिन के सम्मान में सिंदूर प्रयोग किया जाता है। सौंदर्य प्रसाधन के
रूप में भारतीय संस्कृति में प्रचलित है।
नाग-पूजा- भारतीय संस्कृति में सॉपों की पूजा एवं चित्रकारी प्राचीनकाल
से ही प्रचलित है। इनकी कलाकृतियाँ अनेक स्थलों में मिलती हैं। मथुरा एवं पाषाण
कालीन चित्रकला में इसके दर्शन होते हैं। मोहनजोदड़ो काल से ही इसकी परंपरा उस समय
के सिक्कों में मिलती है। नागपूजा को लेकर इनकी पौराणिक मान्यताएँ भी प्रचलित हैं।
कहते हैं कि नागपंचमी के दिन नाग बाबा को दूध पिलाना चाहिए लोग अपने घरों में नाग
की पूजा दूध के साथ करते हैं। सावन मास में नाग की मूतियाँ बनाकर पूजा करने की
परंपरा विद्यमान है।
शीतला
माई-
भारत के विभिन्न क्षेत्रों के साथ
भोजपुर में भी शीतला माँ के अनेक रूपों की पूजा गीतों के साथ चैत्र मास के शुक्ल
पक्ष में नौ दिनों तक की जाती है। जिसमें माँ के अनेक रूपों विंध्यवासिनी, दुर्गा, काली, कामाख्या देवी, कलकत्ता वाली
काली माँ आदि की पूजा पूरे श्रद्धाभाव एवं प्रसन्नता के साथ मनोयोग से अनेक कल्याणकारी कार्यो एवं महिलाएँ
अपने बच्चों एवं सुहाग की रक्षा, धन-संपदा हेतु व्रत रखती हैं। गीतों की बौछार से माँ को
प्रसन्न करती हैं।
घरौंदा- भारतीय संस्कृति से लेकर अभी तक घरौंदा बनाने की पंरपरा
विद्यमान रही है। भोजपुर क्षेत्र में घरौंदा का विशेष महत्व है, जिसमें दिवाली
के कई दिन पहले से घर की कुंवारी लड़कियों
के द्वारा मिट्टी से घरौंदा तैयार किये जाते हैं एवं मिट्टी के कई खिलौनों के साथ
गृहस्थ जीवन की छोटी-छोटी सामग्री तैयार की जाती है। इसके बाद गांव की महिलाओं के
द्वारा दिवाली के दिन गाना गाती हैं एवं लड़कियाँ अपने भाई के सुख समृद्धि हेतु
लावा, मिठाई देती हैं। इससे यह पता चलता है कि लड़कियों का गृहस्थ जीवन के प्रति
झुकाव प्रदर्शित होता है एवं उनमें सृजनात्मकता दृष्टिगोचर होती है, यहीं से
स्थापत्य कला के प्रारंभ के दर्शन होते हैं।
कोठिला- प्राचीन काल में जब धातु के बर्तन नहीं थे, मनुष्य मिट्टी के
अनेक प्रकार के बर्तन एवं कलाकृतियों का निर्माण करता था, उन्हीं में से
एक है कोठिला। बिहार क्षेत्र में किसानों के द्वारा उत्पन्न अनाज भण्डारण हेतु
इसका प्रयोग किया जाता है, घर की महिलाओं के द्वारा यह मिट्टी और भूसा को मिलाकर घर के
किसी सुरक्षित स्थान पर कई दिनों के प्रयास करने के बाद कई हिस्से में बनता है फिर
सभी को जोड़कर उसको मिट्टी से संवार-सजा देते हैं। इसी में अनाज का भण्डारण किया
जाता है। यह कलात्मकता का प्रतीक है जो जितना अधिक समृद्ध होता है उसके घर में
उतने अधिक कोठिले होते हैं ऐसा माना जाता है। शादी के समय एक परंपरा है कि वर-वधु
के द्वारा कोठिले में अनाज भरवाया जाता है एवं गीत गाये जाते हैं।
कपड़ों
से निर्मित खिलौने- कोई भी लड़की
अपनी शादी की विदाई के साथ बहुत सारे खिलौने लाती है जो कपड़े से निर्मित होते हैं जिसको
लड़की स्वयं अपने हाथों से निर्मित करती है। ऐसी मान्यता है कि जो लड़की जितने अधिक
अच्छे सुंदर कलात्मक वस्तुएँ अपने साथ लाती है, उसमें उतनी ही
अधिक रचनात्मक होती है। जिनसे वह अपने घर को सजाती है और उसे सम्मान मिलता है जो एक
सुंदर निपुण गृहणी की पहचान होती है। प्राचीन काल में घर में निर्मित खिलौने का ही
प्रचलन था, जिससे धन की बचत होती है किन्तु वर्तमान समय में सभी प्रकार
के खिलौने बाजार में उपलब्ध हैं जो बहुत कीमती होते हैं जिन्हें लोग बाजार से ही
खरीदते हैं। धीरे-धीरे घर में निर्मित खिलौने का लोप हो रहा है।
आभूषण- प्राचीन काल से ही सौंदर्य का महत्व रहा है। शारीरिक सुंदरता
के साथ आभूषणों के द्वारा निर्मित सुंदरता अपना प्रभाव स्थापित करती रही है। चाहे
स्त्री हो या पुरुष सभी के सौंदर्य वृद्धि करने में आभूषण सहायता करते हैं। आभूषण
कई प्रकार के होते हैं जो अनेक धातुओं,
लकड़ी एवं हाथी दांत से निर्मित होते
हैं। प्राचीन काल में हाथी दांत से बने आभूषणों का विशेष महत्व था। हाथी दांत की कंधियाँ, चूडियाँ बनायी
जाती थी जो आज भी प्रचलित हैं।
पानपत्ता- भारतीय संस्कृति में पान के पत्तों का विषेष महत्व रहा है, खाने में, पूजा-पाठ में, दवा के रूप में
पानपत्ता प्रयोग में आता है। भोजपुर क्षेत्र में विशेष रूप से मिथिलांचल में कुछ
वस्तुएँ हैं, जो विश्व प्रसिद्ध हैं, जैसे मखाना, पान-पत्ता
आदि। मधुबनी या मिथिलांचल में तो यह वहाँ की संस्कृति की पहचान ही है, कहा भी जाता है
कि ‘मुँह में पान-मखान और मुस्कान यही है मिथिलांचल की पहचान’। प्रारंभ में पान का
प्रयोग मुँह को लाल करने, सौंदर्य प्रसाधन के रूप में किया जाता था किन्तु कुछ समय
बाद धार्मिक कार्यों, आयुर्वेद में संपूर्ण भारत में प्रयोग किया जाता है।
पचकोसी
मेला-
बिहार प्रांत के बक्सर जिले में कार्तिक
पूर्णिमा के बाद अगहन माह में लिट्टी -भाटा खाने की परंपरा है, सभी वर्ग के
लोगों में बड़ा उत्साह रहता है, लिट्टी और भाटा के भरता को खाने-बनाने का। इसी समय बक्सर में पचकोसी
मेले का आयोजन होता है, जो पांच भिन्न-भिन्न स्थानों पर आयोजित होता है जो नाम से ही
स्पष्ट होता है। बड़े उत्साह, आनंद के साथ लोग पंचकोसी मेला की तैयारी करते हैं जिसमें
लिट्टी और भाटा-भरता बनाने की सामग्री को इकट्ठा करके ले जाते हैं और पांच दिनों
तक पांच अलग-अलग जगह पर लिट्टी बनाकर आनंदपूर्वक खाते हैं। पचकोस बक्सर में आयोजित
होने वाला एक खास मेला है। खास इसलिए है कि यह मेला एक जगह नहीं पांच भिन्न-भिन्न
स्थलों पर आयोजित होता है।
चैता- चैत माह में ढोल तासे के साथ गांव मोहल्ले में गाने की आवाज
गूँजने लगती है। बसंत ऋतु के आगमन से ये गाने प्रारंभ हो जाते हैं। प्रकृति
सुसज्जित हो जाती है और तरह-तरह के फूल,
आमराइयाँ सुगंध बिखेरती हैं। ये गाने
श्रृंगारिक होते हैं, एक वियोगिनी जिसका पति परदेश में है, इसका विरह वर्णन
इन गानों में दिखता है। वह उम्मीद लगाती है कि कब उसका पति आयेगा और वह उसके साथ
खुशियाँ मनायेगी। उसे प्रकृति की कोई भी कला सुंदर नहीं लगती है बल्कि कष्ट देती
है। ‘माइल चहत उतपाती रामा। पिया नाहीं अइले।‘
गंवई
रंगमंच-
भारतीय ग्रांमीण क्षेत्र में मनोरंजन
एवं कलात्मक अभिव्यक्ति हेतु नाट्य मंचन की परंपरा है। अभिनय हेतु गाँव के ही
व्यक्ति वेष-भूषा बनाकर कोई सामाजिक समस्या को लेकर अभिनय करते हैं। दिनभर के कार्यों
से थके लोग बड़ी उत्सुकता के साथ नाटक का अवलोकन कर मनोरंजन करते हैं जिससे लोगों
में आपसी भेद-भाव समाप्त होता है। भाई-चारे की भावना, संस्कृति का
संरक्षण, सामाजिकता का विकास एवं साहित्यिक विकास होता है। भेद-भाव
जाति वर्ग से ऊपर एक अलग समाज का निर्माण हो जाए, जिसके केन्द्र
में नाटक होता है, जहाँ दर्शकों की स्थिति काफी अच्छी होती है। ग्रामीण लोगों
में कलात्मकता भरी होती है, जिनको दिखाने का अवसर मिलता है। लेकिन गांव का नाट्य मंचन का
विकास नहीं हो पाता है, इसके पीछे कारण जो भी रहा हो । ग्रामीण प्रतिभा को आगे लाना
है तो इस ओर ध्यान देने की जरूरत है जिससे हमारी परम्पराएँ जीवित रहें।
लोक
चित्र शैली- पारंपरिक चित्रकला शैली का विकास
भोजपुर क्षेत्र में हुआ है। बिहार की मधुबनी चित्रकला शैली विश्व प्रसिद्ध है।
इसके अंतर्गत घरेलू चित्रकारी आती है जो गांव की महिलाओं द्वारा की जाती है। शादी, ब्याह के समय, पर्व-त्यौहार के
समय अन्य विशेष अवसरों पर चित्रकारी की जाती है। कोहबर लेखन एक भित्तिचित्र है जिसमें
अनेक प्रकार के चित्र बनाये जाते हैं जैसे बांस, पाल्की, नाल्की, पुरैन-पत्ता, तोता, सिन्धौरा, पानपत्ता आदि के
चित्र जीवन के पहलुओं से संबंधित होते हैं।
उपसंहार
-
इस प्रकार से भोजपुरी लोक परम्पराएँ
बहुत ही समृद्ध और दृढ़ता के साथ लोकप्रिय हैं। ये लोक परम्पराएँ हर जगह अपना
वर्चस्व बनाये हुए हैं इसके अनेक लाभ हैं। लोक परंपराएँ संस्कृति को जीवित रखती हैं।
सामाजिक, आर्थिक, नैतिक व्यवस्था को बनाये रखने में सहयोग करती हैं। परंपराएँ
समाज के विकास में अपना योगदान देती हैं। समाज अनेक बुराइयों से बच जाता है। लोगों
में आपसी भाई-चारे की भावना का विकास होता है। ग्रामीण क्षेत्र में छिपी हुई प्रतिभाओं
का विकास होता है एवं उपयोग हो पाता है। कलात्मकता के विकास से समय के उपयोग के
साथ आर्थिक रूप से लोग समृद्ध होते हैं। हमारे लोक पर्व-त्यौहार, संगीत जीवित
रहते हैं जो किसी भी देश के विकास में योगदान देते हैं । जिस देश की परंपराएँ
जितनी समृद्ध होती हैं वह देश उतना ही तेज गति से विकास करता है। इसलिए परम्पराओं
को जीवित रखना, संरक्षण करना हर नागरिक का कर्तव्य होना चाहिए।