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प्रधान (2001). छत्तीसगढ़ की बिरहोर विशेष पिछड़ी जनजाति में पारंपरिक जाति - पंचायत. Journal of Ravishankar University (Part-A: Science), 14(1), pp.73-76.https://doi.org/
छत्तीसगढ़ की बिरहोर विशेष पिछड़ी जनजाति में पारंपरिक जाति - पंचायत
अशोक प्रधान
मानवविज्ञान अध्ययनशाला , पं . रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय , रायपुर
सार
- संक्षेप: सामाजिक
सुव्यवस्था एवं शांति स्थापित करने के लिए प्रत्येक समाज में नियम तथा नियमों के
पालन कराने के लिए सामाजिक व्यवस्था होती है । आदिम समाज में कानून , न्याय तथा सरकार व्यवस्था अलिखित तथा परंपरा के रूप
में एक पीढ़ी से दूसरे पीढी तक हस्तांतरित होती हुई आ रही है । समाज में मानवीय
किया - कलापों के दौरान समाज के अन्य लोगों के साथ व्यवहार करने के लिए अनेक
सामान्य नियम / व्यवहार / रीति प्रचलित हो जाते हैं जिन्हें उस समाज के अधिकांश
लोग मानते हैं । इसे मानव वैज्ञानिक एवं समाज वैज्ञानिक जनरीति कहते हैं । यह जनरीति
एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी हस्तांतरित होती रहती है । प्रत्येक पीढ़ी में इसका सफल
अनुभव इसे और भी अधिक दृढ तथा सर्वमान्य बना देती है । पीढी दर पीढी हस्तांतरित
सामाजिक मान्यता प्राप्त जनरीति प्रथा कहलाती है । धीरे - धीरे यह प्रथा अत्यधिक
दृढ तथा सर्वमान्य हो जाती है । इस सामाजिक प्रथा के पालन न करने वाले को जब दंड
देने की व्यवस्था की जाती है तब प्रथा विधि अथवा कानून का रूप धारण कर लेती है ।
समाज आदिम हो या आधुनिक इनमें प्रचलित कानून का आधार प्रथा और जनरीतियां ही रही है
। वर्तमान अध्ययन बिरहोर विशेष पिछड़ी जनजाति के परंपरागत जाति पंचायत पर किया गया
है।
शब्द
कुंजी
: बिरहोर जाति , पंचायत , बुजुर्ग - परिषद , जनरीति
. सामाजिक प्रथा
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